ईद-मिलाद-उन-नबी मोहब्बत, अमन और इंसानियत का पैगाम बेलगहना में हर तरफ जश्न का माहौल ईद-मिलाद-उन-नबी करोड़ों मुसलमानों के लिए नबी की विलादत को याद करने, उनकी सीरत सुनने और उनके बताए रास्ते पर चलने की याद दिलाता है.

ईद-मिलाद-उन-नबी मोहब्बत, अमन और इंसानियत का पैगाम बेलगहना में हर तरफ जश्न का माहौल ईद-मिलाद-उन-नबी करोड़ों मुसलमानों के लिए नबी की विलादत को याद करने, उनकी सीरत सुनने और उनके बताए रास्ते पर चलने की याद दिलाता है.

       शेख अज़ीज़ खान की ख़ास रिपोर्ट 

ईद-मिलाद-उन-नबी मोहब्बत, अमन और इंसानियत का पैगाम बेलगहना में हर तरफ जश्न का माहौल

ईद-मिलाद-उन-नबी करोड़ों मुसलमानों के लिए नबी की विलादत को याद करने, उनकी सीरत सुनने और उनके बताए रास्ते पर चलने की याद दिलाता है.

 

बेलगहना में ईद-मिलाद-उन-नबी की तैयारियां जोरो सोरों से रहा हैं. मस्जिदों और मदरसों में सजावट से लेकर मिलाद की महफिलों तक की तैयारियां चल रही हैं. कहीं नात-ए-पाक की तैयारी हो रही है, तो कहीं जुलूस के लिए इंतजाम किए जा रहे हैं. मुस्लिम समुदाय के लिए ये दिन पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत की खुशी और उनकी सीरत को याद करने का खास मौका माना जाता है.

ईद-मिलाद-उन-नबी को आम तौर पर रबी-उल-अव्वल के महीने में पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत की याद में मनाया जाता है.12 रबी-उल-अव्वल को मिलाद मनाने की परंपरा है,    

ईद-मिलाद-उन-नबी मोहब्बत, अमन और इंसानियत का पैगाम 

एक मौलाना ने कहा कि अल्लाह तबारक व तआला ने जब इस दुनिया को तख्लीक किया, तो सबसे पहले नबियों का सिलसिला शुरू हुआ. इसके बाद नबियों का सिलसिला जारी रहा. एक लाख चौबीस हजार या दो लाख चौबीस हजार नबी, जैसा कि रिवायतों में मिलता है, दुनिया में तशरीफ लाए. इन तमाम नबियों में सबसे आखिरी नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आमद हुई. जिस वक्त हमारे प्यारे आका नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस दुनिया में तशरीफ लाए, उस वक्त हालात बेहद नाजुक थे. जमीनी सतह पर इंसानियत बहुत मुश्किल दौर से गुजर रही थी. 

उलेमा के मुताबिक पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आमद को इस्लामी इतिहास में एक बेहद अहम पड़ाव के तौर पर देखा जाता है. यही वजह है कि मिलाद के मौके पर उनकी जिंदगी और उनकी सीरत को बयान किया जाता है. महफिलों में कुरआन की तिलावत होती है, नात-ए-पाक पढ़ी जाती है, उलेमा तकरीर करते हैं और लोगों को पैगंबर साहब की जिंदगी से जुड़े वाकये सुनाए जाते हैं. कई जगह बच्चों के लिए नात और सीरत से जुड़े कार्यक्रम भी रखे जाते हैं

मौलाना सलीम कादरी ने कहा कि यह हमारे हुज़ूर, सरवरे कायनात, सरकार-ए-दो-आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जब पैदाइश हुई है, उनकी विलादत की खुशी में मनाई जाती है. यानी इस दिन की तैयारियां सिर्फ सजावट तक सीमित नहीं रहतीं. घरों से लेकर मस्जिदों तक और मदरसों से लेकर मोहल्लों तक लोग अपने-अपने तरीके से इस दिन को मनाने की तैयारी करते हैं. कहीं घरों पर सिनी खीर मिठाई और कई तरह के पकवान का व्यवस्था की जाती है, कहीं धार्मिक महफिल का इंतजाम होता है, तो कहीं लोगों के लिए खाने-पीने की व्यवस्था की जाती है. कई जगह जरूरतमंदों की मदद और लोगों में खाना बांटने जैसे सामाजिक काम भी किए जाते हैं.

बेलगहना में ईद-मिलादुन्नबी के जुलूसों की अपनी एक अलग पहचान रही है. जुलूसों के रास्ते में पड़ने वाली मस्जिदों और बाजारों में भी सजावट देखने को मिलती है. नात और सलाम की आवाजों के बीच जब लोग जुलूस में आगे बढ़ते हैं तो माहौल पूरी तरह अकीदत के रंग में रंगा नजर आता है.पैगंबर की विलादत की खुशी मनाना और उनकी जिंदगी को याद करना. यही वजह है कि जुलूसों और महफिलों में नात के साथ-साथ सीरत पर भी जोर दिया जाता है.

ईद-मिलाद-उन-नबी सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि करोड़ों मुसलमानों के लिए अपने नबी की विलादत को याद करने, उनकी सीरत सुनने और उनके बताए रास्ते पर चलने की याद दिलाने वाला मौका है

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